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गणित शिक्षणशास्त्र

 


वेन हीले 【Van Hiele】-
यह मॉडल एक सिद्धान्त का वर्णन करता है कि कैसे छात्र ज्यामिति सीख सकते है, वेन हील नीदरलैंड के गणितज्ञ थे
बालक ज्यामिति को किस तरह से सीखते है विभिन्न स्तरों को बताया है इसमें कुछ पाँच स्तर है-

● Level 0-चाक्षुषीकरण
बच्चे जिन चीजों को जानते है या उनकी इमेज बना लेते है आकृतियों की दिखावट के अनुसार वर्गीकरण करते है
उदाहरण-बिस्किट को देखकर आयत बताना

● Level 1- वर्गीकरण
Shapes के गुणों के आधार पर वर्गीकरण

● Level 2- अनौपचारिक निगमन
आकृतियों के बीच सम्बन्ध बनाना शुरू

● Level 3-औपचारिक निगमन
आकृतियों के फार्मूला ढूढने लगता है

● Level 4-दृढ़ता
ज्यामितीय चिंतन के अनुसार खुद से चीजें बनाता है

गणित अधिगम अवस्था-
जन्म से लेकर किशोरावस्था तक छह अवस्थाओं से होकर गुजरता है
1. आरंभिक अवस्था 【जन्म-03 वर्ष】-बड़ी या छोटी वस्तु पहचानना
2. मिलान अवस्था 【03-05 वर्ष】-दो संख्याओं की गिनती बोलना
3. परिमाणात्मक अवस्था 【05-06 वर्ष】-विभिन्न तरीकों से संख्या व्यक्त करना
4. विभाजन आत्मक अवस्था 【06-09 वर्ष】-बड़ी संख्याओं को स्थानीय मान पर विभाजन
5. गुणनखंड अवस्था 【09-11 वर्ष】-दर्जन में वस्तुओं का ज्ञान
6. संक्रियात्मक अवस्था 【11-13 वर्ष】-संक्रियाएँ व दशमलव संख्या

मूल्यांकन के प्रकार-
● निरीक्षण
● लिखित परीक्षाएं
● प्रश्नावली
● मौखिक परीक्षाएं
● प्रयोगात्मक परीक्षाएं
● चेक लिस्ट
● रिकॉर्ड
● साक्षात्कार

मूल्यांकन के सोपान-
● शिक्षण उद्देश्यों का निर्धारण
● अधिगम अनुभव की योजना बनाना
● व्यवहार परिवर्तन

गणितीय चिंतन-
● अभिसारी चिंतन-बंद अंत वाले प्रश्न 【उत्तर एक शब्द होता है】
● अपसारी चिंतन-खुले या मुक्त अंत वाले प्रश्न 【उत्तर व्यापक हो सकते है】

गणित की आधारभूत संरचनाएं-
● बीजगणितीय संरचना
● तलरूप संरचना
● क्रमिक संरचना

■ गणित में सतत व व्यापक मूल्यांकन-
1. सतत मूल्यांकन
2. व्यापक मूल्यांकन

◆ पोर्टफोलियो-बालक से समग्र व्यक्तित्व का आकलन
◆ मूल्यांकन-मापन+निर्णय

गणित में नैदानिक कार्य और उपचारात्मक शिक्षा-
1. निदान का प्रारंभ से ही होना चाहिए, तात्पर्य यह है कि विषय शिक्षण प्रारंभ करने से पहले छात्रों को सही स्थिति निदान द्वारा ज्ञात की जानी चाहिए यह कार्य प्रत्येक अध्याय के पश्चात करना चाहिए जिससे उसका निवारण या उपचार उसी समय पर किया जा सकें
उद्देश्य-
● गणित विषय के शिक्षण तथा अध्ययन में सुधार करना
● गणित के पिछड़े बालकों को पहचानना, जिससे सुधार हेतु निदान संभव हो सकें
● विषय सम्बन्धी विकास में रुकावट आने वाले तत्वों को जानना तथा उपचारात्मक सुझाव देना
● अध्ययन पद्धतियों का दिशा निर्देशन करना
● गणित में कमजोरी आँकना और उसके आधार पर सामूहिक उपचारात्मक पद्धति अपनाना
● पाठ्यक्रम तथा पाठ्यवस्तु में कमियों के आधार पर परिवर्तन लाना

2. विषय के क्षेत्र में निदानात्मक कार्य 【Diagnostic Work】 की समाप्ति पर छात्रों के लिए कमजोरी दूर करने हेतु शिक्षण देने की व्यवस्था की जानी चाहिए, इस कार्य को उपचारात्मक शिक्षण कहा जाता है
एक बार छात्र की गणित में कमजोरी का पता चलने पर उपचारात्मक कार्य सरल हो जाता है
● छात्रों की कमजोरी को दूर करने हेतु उसी पाठ्यक्रम को दोहराना चाहिए
● छात्रों की कमजोरी के आधार पर छोटे-छोटे समूह बनाकर अलग-अलग शिक्षण की व्यवस्था की जानी चाहिए
● गणित के क्षेत्र में छोटे प्रोजेक्ट तथा समस्याएं देनी चाहिए
● छात्रों को अध्याय की समाप्ति पर अभ्यास तथा गृह कार्य दिया जाना चाहिए
● भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में गोष्ठियों का आयोजन

गणित के पाठ्यक्रम के सिद्धांत तथा प्रवृत्तियां-
● गणित के अनुभवों में अविच्छिन्नता
● विभिन्नता
● शिक्षण के उद्देश्यों में परिवर्तन के लिए स्थान
● शिक्षण का व्यक्तित्व
● विषयों में सह सम्बन्ध
● गणित की विज्ञान के क्षेत्र में वृद्धि
● गणित जीवन का एक मार्ग है
● पाठ्यक्रम में छात्रों के गणित सम्बन्धी अभीवृत्ति तथा चातुर्य के विकास हेतु सामग्री
● पाठ्यक्रम समान तथा स्थिर न हो बल्कि लचीला हो

विभिन्न स्तरों पर गणित पाठ्यक्रम-

1. पूर्व प्राथमिक स्तर-इसमें सभी अधिगम खेलने-कूदने के क्रियाकलापों के माध्यम से होते है सरल तुलनाएं करना, एक समय पर एक ही दिशा में वर्गीकरण करना तथा आकारों तथा समिमितियों को पहचानना

2. प्राथमिक स्तर-इस स्तर पर गणित के प्रति एक सकारात्मक अभिवृत्ति विकसित करने की आवश्यकता है गणितीय खेल, पहेलियों व अन्य मनोरंजनपूर्ण क्रियाकलाप जिनका सम्बन्ध दैनिक जीवन से हो, संख्या, संख्याओं की संक्रिया, स्थानिक समझ, पैटर्न मापन, आंकड़ा प्रबंधन आदि

3. उच्चतर प्राथमिक स्तर-बीजीय अवधारणा तथा हल, सामान्यीकरण, अधिगम के इस स्तर पर विद्यार्थियों के त्रिविमीय विवेचन एवं कल्पना कौशलों को संदर्भित करने के अवसर प्रदान करना

4. माध्यमिक स्तर-इस स्तर पर पढ़ाएं जाने वाले गणितीय प्रतिमान, आंकड़ों का विश्लेषण तथा उनकी व्याख्या, सम्बन्धों तथा पैटर्नों की व्यक्तिगत और सामूहिक खोज, कल्पना का कौशल और सामान्यीकरण तथा अनुमान लगाना

5. उच्चतर माध्यमिक स्तर-गणित पाठ्यचर्या द्वारा विद्यार्थियों को व्यापक गणितीय अनुप्रयोग करने का अनुभव तथा अनुप्रयोगों को करने में समर्थ, आधारभूत साधन प्रदान करने चाहिए, इस स्तर पर विद्यार्थी अपने कैरियर चुनने की शुरुआत करता है

अध्यापक के गुण-

1. विषय का पूर्ण ज्ञान होना चाहिए-
पूर्ण जानकारी, बिना संकोच के पाठ्य-वस्तु को दूसरों के सम्मुख प्रस्तुत कर सकें

2. पाठ्य-विधियों की शिक्षण की आवश्यकता-
भिन्न-भिन्न Topics को पढ़ाने के लिए भिन्न-भिन्न विधियों का प्रयोग

3. गणित अध्यापक को विषय के लिए उत्साहित होना चाहिये-
जब अध्यापक के अंदर उत्साह नही होगा तो वो विषय के प्रति रुचि तथा उत्साह उत्पन्न नहीं कर सकता

4. अध्यापक को संपूर्ण तैयारी करनी चाहिए-
कक्षा में अध्यापक का समय नष्ट न करें, वह कक्षा मैसा अधिक से अधिक ज्ञान दें

5. प्रत्येक पाठ की तैयारी-
प्रत्येक पाठ की तैयारी करें तभी अध्यापक सफल हो सकता है

पाठ्यपुस्तक की विशेषताएं/गुण-
● सिद्धान्त तथा मुख्य-मुख्य तथ्य कक्षा के स्तर को देखते हुए जटिल न हो
● सम्बंधित कक्षा के पाठ्यक्रम में उपयोग करें
● पाठ्यपुस्तक को छोटे-छोटे अध्यायों में बांटना चाहिए
● सूत्र, समीकरण, सम्बन्ध आदि की व्याख्या सरल ढंग से हो
● पाठ्यपुस्तक में उदाहरण स्पष्ट
● पाठ्यपुस्तक नवीन आविष्कारों तथा समय के अनुकूल
● पाठ्यपुस्तक में चित्र, गुण, उदाहरण का समावेश

गणित की शिक्षण 【अध्यापन】 विधियां-

1. आगमन विधि 【Inductive Method】-
इस विधि में उदाहरणों के माध्यम से किसी सामान्य नियम को निकलवाया जाता है
तीन सूत्रों का प्रयोग-
● ज्ञात से अज्ञात की ओर
● विशिष्ट से सामान्य की ओर
● स्थूल से सूक्ष्म की ओर

गुण- स्वयं परिश्रम करके नवीन नियमों की खोज करता है ज्ञान स्थायी होता है, आत्मनिर्भरता व आत्मविश्वास बढ़ता है अनुसंधान हेतु प्रोत्साहन मिलता है विषय रुचिकर हो जाता है

दोष-ज्ञानार्जन बहुत धीमी गति से होता है समय अधिक लगता है, पाठ्यक्रम पूरा नहीं हो जाता अध्यापक निष्क्रिय हो जाता है

2.निगमन विधि 【Deductive Method】-
आगमन विधि की पूर्णतया विपरीत विधि है इसमें पहले नियम बता दिया जाता है फिर उदाहरण प्रस्तुत किया जाता है
सूत्र-
● अज्ञात से ज्ञात की ओर
● सामान्य से विशिष्ट की ओर
● सूक्ष्म से स्थूल की ओर
● सिद्धान्त से उदाहरण की ओर

गुण-समय की बचत, अधिक प्रश्न हल, स्मृति में वृद्धि तथा बार-बार अभ्यास

दोष-ज्ञान अपूर्ण व अस्पष्ट, रटने की प्रवृत्ति उत्पन्न व आत्मनिर्भरता व आत्मविश्वास नहीं

3. विश्लेषण विधि 【Analytic Method】-
इस विधि में किसी तथ्य या समस्या को टुकड़ो में विभाजित कर दिया जाता है

गुण-तार्किक एवं वैज्ञानिक विधि, छात्र अधिक क्रियाशील रहते है व सीखा ज्ञान स्थायी रहता है

दोष-छोटे बच्चों को सफलता नही, बच्चें ऊब जाते है व अमनोवैज्ञानिक व अपूर्ण विधि

4. संश्लेषण विधि 【Sythentic Method】-
विश्लेषण की विपरीत विधि है सभी खंडों को मिलाकर उसका हल प्रस्तुत किया जाता है
पद-
● समस्या के आधार पर ज्ञान
● समस्या का हाल
● समस्या का ज्ञान

गुण-मनोवैज्ञानिक विधि व समय और शक्ति की बचत
दोष-रटन्त ज्ञान व निष्क्रिय, नवीन ज्ञान की खोज नहीं

5. प्रयोगशाला विधि 【Laboratory Method】-
इस विधि में छात्र स्वयं करके ज्ञान को अर्जित करते है इसमें सिद्धांतों का प्रतिपादन-
● करके सीखना
● निरीक्षण से सीखना
● मूर्त से अमूर्त की ओर
रेखागणित में सभी नियमों का निर्माण करना प्रयोगशाला विधि पर आधारित है

गुण-छात्र रुचि लेते है, गणित के प्रयोग आसानी से हो सकते है तथ्य व सिद्धान्त का ज्ञान स्पष्ट

दोष-शिक्षण की गति धीमी, आर्थिक भार व तर्क शक्ति का विकास नही

6. अनुसन्धान विधि 【Heuristic Method】-
प्रो. एच ई आर्मस्ट्रांग इसे स्वतः शोध विधि भी कहते है ह्यूरिस्टिक शब्द ग्रीक भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है-मैं मालूम करता है, इस विधि में छात्र अन्वेषक के रूप में क्रियाशील रहते है इस विधि में प्रक्रिया का केंद्र विद्यार्थी है

गुण-विद्यार्थी नवीन खोज करते है, आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता व वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास होता है व गृहकार्य देने की आवश्यकता नहीं

दोष-छोटी कक्षाओं में असफल व समय की बर्बादी

7. परियोजना विधि 【Project Method】-
यदि शिक्षक समस्याओं का हल प्रयोग द्वारा कर सकें तो पद्धति का प्रयोग परियोजना कहा जाता है इसमें शिक्षक क्रियाशील रहता है

पद-
1. प्रस्तावना
2. शीर्षक
3. समस्या की व्याख्या
4. परिकल्पना
5. सामग्री
6. विधि
7. आंकड़े एकत्रित करना
8. परिणाम
9. मूल्यांकन
10. परिणामों का नवीन परिस्थितियों में उपयोग
11. पठन सामग्री की सूची

8. समस्या समाधान विधि-
समस्या समाधान विधि आधुनिक मनोवैज्ञानिक विचारधाराओं की देन है छात्र समस्या के सभी पहलुओं पर विचार करके वैज्ञानिक ढंग से उनके समाधान का प्रयास करता है
पर्यावरण शिक्षा के शिक्षण के लिए उपर्युक्त विधि है

9. व्याख्यान विधि-
यह विधि उच्च कक्षाओं के लिए लाभप्रद है परंतु शिक्षको को चाहिए कि प्रश्न-उत्तर विधि का प्रयोग भी करें

गुण-अधिक पाठ्यपुस्तक को कम समय मे दिया जा सकता है बड़ी कक्षाओं में उपर्युक्त व शिक्षक के लिए सरल

दोष-कक्षा में ध्यान नहीं देते विद्यार्थी का मस्तिष्क सोचता नही, एक विचार दूसरे के बाद शीघ्रता से आता है विद्यार्थियों का संपर्क नही, घर पर अध्ययन अधिक

10. डॉगममैटिक विधि-
इसमें गणित को याद कराया जाता है इसमें बालकों को रुचि उत्पन्न नहीं हो पाती

■ आवश्यक सामग्री-
1. गिनतारा 【अबेकस】-
गणक साँचा/गणन उपकरण तारों पर बंधे मोतियों वाले एक बांस फ्रेम के रूप में दिखाई पड़ता है नेत्रहीन बालकों के लिए उपयोगी, स्थानीय मान, जोड़ घटाना आदि

2.जियो बोर्ड-
खुली व बंद आकृति सिखाने लकड़ी का एक आयताकार चौखटा जिस पर बराबर दूरी पर कीलें लगी रहती है रबर बैंड या धागे का इस्तेमाल करके गतिविधियों ,2D आकृति

3. ग्रिड पेपर/संख्या चार्ट-
दशमलव संख्याओं को लिखने स्थानीय मान

4. ग्राफ पेपर-
2D आकृति को समझने में क्षेत्रफल, परिमाप समझने में

5. डॉट पेपर/बिन्दुशीट-
ज्यामितीय संकल्पनाओं को समझने में ज्यामितीय आकृति की सममिति जानना

6. डाइन्स ब्लॉक-
गणितीय संक्रियाओं में

7. Tengram-
ज्यामितीय आकृति की जानकारी, चित्र के माध्यम से पहेलियों व खेल के माध्यम से इसमें 07 आकृति होती है, 5 त्रिभुज, 1 वर्ग व एक समांतर चतुर्भुज होता है




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